Friday, September 11, 2009

झांसी की रानी की तस्वीर







पिछले दिनों अपने ब्लॉग पर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की तस्वीर के बारे में बताया था। खबर के साथ झांसी की रानी तस्वीर भी थी। लेकिन वो तस्वीर सही नहीं थी। ई-पेपर भास्कर डॉट कॉम पर खबर के साथ जो तस्वीर प्रकाशित की गई.. दरअसल वो गलत थी। लेकिन ये खबर सही है कि.. इतिहास के पन्नों में झांसी की रानी की एकमात्र तस्वीर मौजूद है।
भोपाल के फोटोग्राफर वामन ठाकरे ने आज भी उस तस्वीर
को सहेजा हुआ है। एक निजी समाचार चैनल पर इस खबर
को दिखाया गया.. जिसमें लक्ष्मीबाई की भी दिखाई गई।
अपनी भूल को सुधारते हुए.. मैं अपने ब्लॉग पर झांसी की
रानी की वास्तविक तस्वीर दे रही हूं..
पिछली पोस्ट पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें।
अनु गुप्ता
11 सितंबर 2009



Wednesday, September 2, 2009

मैं तरसती हूं..


बारिश की..
एक अलसाई सुबह में,
मैं तरसती हूं..
जागने में आनाकानी के लिए,
मां की एक झड़प के लिए,
भीगे पत्तों, गीली ज़मीन
पर..
अपना नाम उकेरने के लिए।
माटी की सौंधी महक,
तेल की महक के लिए,
एक गरम प्याला
अदरक-इलायची वाला..
और
मद्धम-सी धुनों के लिए।
मैं तरसती हूं अब
उस एक दिन के लिए..

अनु गुप्ता
2 सितंबर 2009

एक थी रानी !

झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कोई तस्वीर इतिहास में मौजूद नहीं है। स्केच या पेंटिंग के जरिए ही उनका चेहरा बनाने की कोशिश की गई है। हिंदी अखबार भास्कर की वेबसाइट पर हाल ही में एक तस्वीर प्रकाशित की गई.. जिसमें बताया गया कि.. वो तस्वीर झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की है.. तस्वीर के साथ उसका विवरण भी दिया गया है। मेरा निजी विचार यही है कि.. तस्वीर की सत्यता पर अब भी संशय है.. लेकिन उस तस्वीर को विवरण समेत मैं यहां पोस्ट कर रही हूं..

प्रस्तुत है विवरण-



अब तक आपने झांसी की रानी की तस्वीर पुस्तकों में स्केच या कैनवास पर ब्रश से उकेरे प्रयासों के सहारे ही देखा होगा, लेकिन भारत में रानी की लक्ष्मीबाई की मूल तस्वीर जिसको आप शायद ही कभी देखें हो।
जी हां ये है झांसी की रानी की 1850 में खींची गई मूल तस्वीर, जिसे सन 1850 में अंग्रेज फोटोग्राफर हॉफमैन ने लिया था। पिछले दिनों विश्व फोटोग्राफी दिवस यानि 19 अगस्त को पद्मश्री वामन ठाकरे द्वारा खींचे गए छायाचित्रों, कैनवास पे उकेरे चित्रों, लेखन कार्य और अन्य कलाकृतियों की प्रदर्शनी का आयोजन भोपाल में किया गया था। इस प्रदर्शनी में उनके विशेष आग्रह पे अहमदाबाद के एक एंटिक संग्रहकर्ता ने यह छायाचित्र भेजा था।
इस फोटो को श्री वामन ने प्रदर्शनी में दिखाकर लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया। क्योंकि लक्ष्मीबाई के मूल फोटो को आज तक शायद ही किसी ने देखा होगा। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि इस दुनिया में रानी लक्ष्मीबाई की तस्वीर उपलब्ध नहीं है। लेकिन इस तस्वीर के एकाएक सामने आ जाने से यह साफ हो गया कि रानी की तस्वीर अभी भी उपलब्ध है।
साभार- भास्कर डॉट कॉम
वेबसाइट पर लेख के लिए इस लिंक पर क्लिक करें

अनु गुप्ता
2 सितंबर 2009

Thursday, August 13, 2009

खिलौना जान कर तुम तो... (दूसरा भाग)


(खिलौना जान कर तुम तो.. इस सीरीज का पहला भाग पढ़ने के लिए लिंक पर जाएं)

तमाशे से कई कलाकारों की छुट्टी हो गई। कई दिन ये खबर हवा में तैरती रही और इसी के साथ ये अफवाह भी कि.. जल्द ही कई और कलाकारों की छुट्टी हो सकती है। बेचारे.. तमाम कलाकारों में डर बैठ गया। सभी संभलकर काम करने लगे.. कुछ ऐसे भी थे.. जिन पर इसका कोई असर नहीं हुआ.. और वो पहले की तरह ही बेहतरीन तमाशा दिखाते रहे। दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी थे.. जो न पहलेकाम करते थे.. और न ही अब कर रहे थे। उन्हें यही लगता कि.. मुनीमजी और साहबजी के होते भला किसका डर। किस माई के बाप की हिम्मत.. जो उन्हें कुछ कहता। खैर, जैसे-तैसे दिन कटने लगे। पुरानी बातों को भुलाकर एक बार फिर तमाशा जमने लगा.. और कलाकार वाकई पुरानी बातें भूल गए। हालाकिं परदे के पीछे काफी कुछ घटता रहा.. अफवाहें उड़ती रहीं। इस दौरान कई कलाकारों ने तमाशे से नाम वापस लिया और उनकी जगह नए कलाकार इस तमाशे से जुड़े। खेल चलता रहा.. टीआरपी कभी गिरती.. तो कभी संभलती।तमाशा चलता रहा। कई महीने बीत गए। फिर देखते ही देखते तमाशा शुरु हुए एक साल हो गया। इस मौके पर जोर-शोर से एक गेट-टूगेदरका आयोजन भी किया गया। खूब चहल-पहल रही। वक्त बीत रहा था.. तमाशा चल रहा था। तमाशे की कमान कभी साहबजी तो कभी मुनीमजके हाथों में घूमती रहती। अक्सर कलाकारों की छंटनी की अफवाहें उड़ती रहती। इसी बीच एक और वाक्या हुआ। और वो ये कि.. कई कलाकारों की पगार बढ़ा दी गई। हालांकि समकक्ष वाले कलाकारों में कुछ की पगार बढ़ी.. तो कुछ की नहीं। एक बार फिर परदे के पीछेचर्चा शुरु हो गई। मुनीमजी और साहबजी पर भेदभाव का आरोप लगा। जिनकी पगार बढ़ी थी.. वो कलाकार अचानक सबकी नजरों में आ गए।उन्हें किसी की वाहवाही मिली.. तो किसी के ताने। अचानक काफी कुछ बदल गया उनके लिए। लेकिन कुछ दिन में फिर हालातसामान्य होने लगे। तमाशा इसके असर से अछूता था। इसलिए फिर बात आई-गई हो गई। लेकिन ये क्या एक बार फिर अचानक कुछउठा-पटक शुरु हो गई। तमाशे में हालात बदले हुए नजर आने लगे। बातें बननी शुरु हो गईं और अफवाहों का बाजार फिर गर्म हुआ।फिर कुछ होने वाला है.. किसी पर गाज गिरने वाली है.. क्या होगा.. हाय राम, ये क्या हो रहा है। ऐसा कैसे हो सकता है.. मुनीमजी और साहबजी के खबरी भी घबराए हुए थे.. क्योंकि अब कुछ भी हो सकता है। कहीं झूठ तो नहीं.. कहीं सच तो नहीं। जो होगा.. देखा जाएगालेकिन फिर भी मन में डर, घबराहट। और सबका डर रंग लाया। कोई अफवाह नहीं, कोई झूठ नहीं, सब सच। देखते-ही-देखते फिर कई कलाकारों की छंटनी हो गई। लेकिन इस बार इसका असर ज्यादा हुआ। तमाशे में मातम छा गया.. और तमाशे की टीआरपी अचानक गिर गई। बचे हुएकलाकारों में नाराजगी और गुस्सा था। लेकिन किसे कहें.. कैसे कहें। तमाशे के दो पाटों के बीच कई जिंदगियां पिस रही थीं। फिर भीसब खामोश.. खुद को बचाने की जुगत में।

..जारी है
अनु गुप्ता
14 अगस्त 2009

Tuesday, July 21, 2009

तुझ में नहीं मैं


तुझ में,
दूर कहीं
भीतर-बाहर की
गहराइयों में भी..
तलाशा खुद को
अपना वजूद
तुझ में ही कहीं
मन में,
दिल में,
और धड़कन में भी
ढूंढी अपनी आवाज
तेरी नजरों में,
ख्वाबों में,
कभी बातों में भी
सोचा मेरे जिक्र को
हंसी में,
नमी में,
तेरी खामोशी में भी
नहीं जाना अपने को
फिर भी
तलाशती रही
देर तक.. दूर तक
लौट आईं बेबस निगाहें
क्योंकि
तुझ में
मैं नहीं.. कहीं नहीं

अनु गुप्ता
21 जुलाई 2009

खिलौना जान कर तुम तो... (पहला भाग)


सुनो.. सुनो.. सुनो.. कस्बे में शुरु होगा एक नया तमाशा.. जिसमें आप ले सकते हो हिस्सा.. सुनो.. सुनो.. सुनो.. तो बन जाओ कलाकार और दिखाओ अपना हुनर..

ऐसे शुरुआत हुई कस्बे में नए तमाशे की.. इस तमाशे के लिए नया मंच तैयार हुआ और ढोल-नगाड़ों के साथ इसकी खबर पूरे कस्बे में फैल गई। जिसके बाद तमाशे में शामिल होने के लिए कई कलाकार आवेदन करने पहुंचे। मंच के साजों-सामान पर हजारों रुपये खर्च किए गए। तमाशे की तरह इसके कर्ता-धर्ता भी नए थे। सो उन्हें जरा भी अनुभव नहीं था। लिहाजा कर्ता-धर्ता ने तमाशे के कलाकारों को चुनने के लिए मुनीम जी और साहब जी की नियुक्ति की और निश्चिंत हो गए। तमाशे की बागडोर इन दो महानुभावों को मिलकर संभालनी है.. लेकिन दोनों में है अभिमान.. और दोनों ही कर्ता-धर्ता की नजरों में चढ़ना चाहते थे। इसलिए कलाकारों को चुनने में अपने आदमियों का खास ख्याल रखा। भई.. अब जब भाई-भतीजावाद चलेगा.. तो योग्य कलाकारों के साथ कुछ अयोग्य कलाकार भी आएंगे ही। लेकिन असली बात तो उन्हीं में है.. क्योंकि यही अयोग्य कलाकार ही तो तमाशे की असली बागडोर संभालेंगे। अब जनाब.. तमाशे के दौरान परदे के आगे और पीछे की कहानी मुनीम जी और साहब जी दोनों जानना चाहते हैं। सो उन्होंने ऐसे कलाकारों को भी चुना.. जो उनके विश्वासपात्र बनकर रहें।

खैर, जोर-शोर से तमाशा शुरु हुआ। कस्बे में चर्चा तो पहले से थी और कुछ उम्दा कलाकारों के साथ साथ मुनीम जी और साहब जी की मेहनत भी रंग लाई। देखते-ही-देखते तमाशा मशहूर होने लगा। कलाकारों में मित्रता हो गई.. हंसी-खुशी दिन बीतने लगे और तमाशे भी खूब जमने लगा।

लेकिन ये क्या.. अचानक परदे के पीछे का माहौल बदला सा नजर आने लगा। खुसर-पुसर शुरु हो गई.. कुछ बड़ा होने वाला है.. सभी कलाकार हैरान-परेशान.. अफवाहों का गरम बाजार.. क्या हुआ, क्या वाकई कुछ हुआ। अरे ये क्या.. ऐसा कैसे.. सही तो सुना है ना.. कहीं सुनने में कोई गलती नहीं हुई हो.. नहीं-नहीं बात तो सोलह आने सच है। ऐसा ही हुआ है.. मुनीम जी और साहब जी की आपस में नहीं बनती.. इसका असर तमाशे पर पड़ने लगा.. तमाशे की टीआरपी गिरने लगी.. तो कर्ता-धर्ता भी गंभीर हो गए.. अब मुनीम जी उनका दायां हाथ हैं और साहब जी बायां हाथ.. करें तो क्या करें.. अब ठीकरा तो कहीं न कहीं फोड़ना ही है.. तो चलो कुछ कलाकारों की छुट्टी कर दी जाए। वैसे भी कौन से तीर मार रहे हैं.. लो जी.. देखते ही देखते कलाकारों की छुट्टी कर दी गई।

...जारी है

Thursday, July 2, 2009

क्या वाकई रास्ता भटक गए हैं ?


'उन्हें रास्ता भटकने से रोकना चाहिए.. लेकिन अब कानून भी उनका साथ दे रहा है।'

ये वो पहली प्रतिक्रिया थी.. जो आज दिल्ली हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला आने के बाद सबसे पहले मुझे सुनाई दी। आज अपने फैसले में दिल्ली हाई कोर्ट ने साफ कर दिया कि.. समलैंगिकता कोई अपराध नहीं है। आपसी रजामंदी से महिला से महिला और पुरुष से पुरुष दोनों ही आपस में संबंध कायम कर सकते हैं। कोर्ट के इस फैसले के तुरंत बाद उन हजारों लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई.. जो अब तक अपराधी होने के डर से अपनी पहचान छिपा कर जी रहे हैं।

भारतीय दंड संहिता की धारा 377 में समलैंगिकता को अपराध बताया गया है। समलैंगिक लंबे अरसे से इस धारा को खत्म करने की मांग कर रहे थे। आखिर अब कानून ने भी इसे मंजूरी दे दी है.. यानि अब समलैंगिकों को अपनी पहचान छिपाने की जरूरत नहीं।

समलैंगिकता हमेशा से ही एक गरम मुद्दा रहा है। कुछ वक्त पहले तक ये ऐसा विषय भी था.. जिस पर बात करना गुनाह माना गया। धारा 377 तकरीबन 149 साल पुरानी है। लॉर्ड मैक्यूले ने साल 1860 में इस धारा को भारतीय दंड संहिता में जोड़ा था। यानि इसकी शुरुआत ब्रिटिश राज में हुई। लॉर्ड मैक्यूले ने समलैंगिकता को अप्राकृतिक बताते हुए.. इसे अपराध की श्रेणी में रखा। देश को आजादी मिली लेकिन समलैंगिक तब भी धारा 377 के गुलाम बने रहे। दबी जुबान में धारा का विरोध होता रहा.. लेकिन सरेआम इस पर बात करना भी अच्छा नहीं माना गया।

डेनमार्क सबसे पहला देश था जिसने साल 1989 में समलैंगिकों को भी आम लोगों जैसे अधिकार दिए। इसके बाद नॉर्वे, स्वीडन और आईलैंड ने भी इसे मान्यता दी।

भारत में भी धारा 377 पर पुनर्विचार करने की मांग उठती रही। नेशनल एड्स कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन, मानवाधिकार आयोग, योजना आयोग यहां तक कि लॉ कमिशन ऑफ इंडिया ने भी समलैंगिकों के अधिकारों की बात कही। वहीं समाज का एक तबका इसे भारतीय संस्कृति के खिलाफ बताता रहा। हाल ही में दिल्ली, चेन्नई, बेंगलुरु में गे प्राइड परेड आयोजित की गई। जिसके महज दो दिन बाद ही दिल्ली हाई कोर्ट ने समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया।

कहीं खुशी की लहर है.. तो विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं। लेकिन समलैंगिकों को ये कहना कि.. वो रास्ता भटक गए हैं और ये सामाजिक नजरिए से गलत है.. अब जायज नहीं है। वक्त बदल रहा है.. इसी परिवर्तन के साथ ही हमें समलैंगिकों को भी अपने समाज में जगह देनी ही होगी। क्योंकि समलैंगिक होना रास्ता भटकना नहीं.. ये प्राकृतिक है। अब कानून भी इसे मान रहा है..कि आप सजा के डर से समलैंगिकों के अधिकारों को नहीं छीन सकते। संस्कृति और समाज का डर दिखाकर उन्हें अपने मुताबिक जीने पर मजबूर नहीं कर सकते।

समलैंगिकता अपराध नहीं है.. ना ही समलैंगिक एलियन्स हैं.. वो इसी समाज का हिस्सा हैं.. और समाज की मुख्यधारा से जुड़कर जीने का उन्हें पूरा अधिकार है।
अनु गुप्ता