Friday, September 24, 2010

मुझे यकीन नहीं


फिर भी
मुझे यकीन नहीं
बाहं छुड़ाकर,
तुम लौट तो गए
ठहरे नहीं,
ना पुकारा मुझे
दर्द छोड़कर,
तुम लौट ही गए
फिर भी
मुझे यकीन नहीं
क्या तुम ही थे
वो
कभी मिले थे
कहीं
सब भूलकर,
तुम लौट तो गए
मुझे यकीन नहीं
बस
इतना ही सफर
या
ना मंजिल ना डगर,
बीच राह छोड़कर
तुम चले तो गए
फिर भी
मुझे यकीन नहीं
खामोश-सा
बेकरार हर लम्हा
बेसब्र सवाल
क्यों
क्यों
टूटकर
मुझे तोड़कर
तुम चले तो गए
फिर भी
मुझे यकीन नहीं

अनु गुप्ता
24 सितंबर 2010


Sunday, June 20, 2010

हलचल


फिर वही उथल-पुथल,
विचारों के सागर में..
फिर वही हलचल
स्वयं पर प्रश्नचिह्न,
स्वयं ही देती उत्तर..
फिर वही हलचल
हां.. बहकते हैं कभी
मेरे भी विचार,
तब जूझती हूं मैं भी..
अपने ही अंतरद्वंद से,
हूक उठाती है मन में..
फिर वही हलचल
स्वयं में उलझी रहूं..
या प्रश्नों को सुलझाऊं,
क्यों नहीं बीत जाता..
बीता हुआ हर एक पल
यादों में तड़पती है,
फिर वही हलचल,
हर लम्हा, हर पल
बस यही हलचल

अनु गुप्ता
20 जून 2010

Monday, June 7, 2010

इस मजाक का शुक्रिया !


हा हा हा हा हा.. ही ही ही ही..
अरे भई हैरान मत होइए. मैं हंस रही हूं. वैसे इस तरह नहीं हंसती. ये तो बस आपको जताने के लिए.
खैर, अब हंसने की वजह भी बता दूं, आप जानना तो चाहते हैं ना. प्लीज इनकार मत करिए. शायद आपको भी हंसी आ जाए. और कुछ नहीं खून की कुछ बूंद बढ़ जाएंगी. ये बात अलग है कि.. ये बढ़ा हुआ खून आंखों से बहने लगे.

घबराइए मत, हो सकता है ऐसा आपके साथ ना हो. चलिए, और ज्यादा सस्पेंस नहीं बढ़ाना चाहती. वक्त की कमी आपके पास भी है और मेरे पास भी.

25 साल लंबा इंतजार, पहले जो त्रस्त थे.. आज एक फैसले से पस्त हो गए हैं. उनके हौंसले अब भी बुलंद हैं, हिम्मत बाकी है.. लेकिन आज जो कुछ हुआ.. जो फैसला आया, वो हमारी कानून व्यवस्था पर सवाल है. 25 साल के इंतजार का ये फल मिला. बस दो साल और 5 लाख रूपये. बस.. क्या इतनी सस्ती है इंसान की जान. हजारों लोग जो काल का ग्रास बन गए, लाखों लोग.. जो आज भी बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं.. उनके इंतजार का ये फल ? शर्मनाक है भोपाल सीजेएम कोर्ट का फैसला. फैसला सुनकर दुख तो हुआ, लेकिन हंसी भी आ गई. कानून जानने वालों का ये हाल ? कमाल है.. ऐसा कैसे हो सकता है ?

भोपाल गैस त्रासदी को 25 साल से ज्यादा बीत गए. भोपाल इंतजार करता रहा. कब फैसला आए और कब उसके बाशिंदों को इंसाफ मिले. लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ. 25 साल पहले कब्रिस्तान में तब्दील हुए शहर ने ऐसा नहीं सोचा होगा कि.. उसे बर्बाद करने वाले २ साल की कैद और पांच लाख रूपये जुर्माने की सजा पर निबटा दिए जाएंगे. क्या कानून यही कहता है ? क्या सचमुच ये इंसाफ है ? सीजेएम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड के 8 अधिकारियों को केवल 2-2 साल की सजा और पांच-पांच लाख जुर्माने की सजा सुनाई. बस इतना ही नहीं, सजा सुनाए जाने के कुछ मिनट बाद 25 हजार के मुचलके पर जमानत भी मिल गई. क्या कहने हैं.. जोर का झटका जोर से ही लगा. 2-3 दिसंबर 1984 की रात मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस ने लोगों का दम घोंट दिया था और आज अदालत के इस फैसले ने उन्हें मारने का ही काम किया है.

25 साल बाद भी फैसला आया तो सीजेएम कोर्ट में.. इसके बाद हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट बाकी हैं. फिर आरोप-प्रत्यारोप, फिर कानून खरीदने-बेचने का काम और शायद फिर भी किसी को सजा नहीं मिलेगी. भोपाल गैस त्रासदी को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना बताया जाता है. और 25 साल के इंतजार के बाद पीड़ितों को आधा-अधूरा इंसाफ मिला. क्या इतने बड़े मामले में ऐसी सजा मिलनी चाहिए. क्या कानून की किताबों में यही लिखा है ? मैं कानून नहीं जानती, कानून के प्रावधान और दांव-पेंच.. सब मेरी समझ से परे हैं. सुना है कानून बस सबूत मांगता है. तो क्या गैस कांड में मारे गए लोगों की भयावह तस्वीरें सबूत नहीं हैं ? क्या आज भी अपंग पैदा होते बच्चे सबूत नहीं हैं ?

मुझे वाकई समझ नहीं आ रहा कि.. आखिर इस फैसले की वजह क्या है. 25 साल का इंतजार और केवल दो साल की कैद और पांच लाख रूपये जुर्माना. मैं क्या करूं ? मुझे समझ नहीं आ रहा. अपनी इसी नासमझी पर मुझे हंसी आ रही है. क्या आप मुझे समझा सकते हैं ? लेकिन प्लीज अब आप मत हंसना।
अनु गुप्ता
7 जून 2010

Sunday, March 14, 2010

मेरे शहर में कितना सन्नाटा है


गोली की आवाज नहीं..
ना कोई धमाका है।
तुम्हारे शहर को देखा
तब सोचा..
मेरे शहर में कितना सन्नाटा है।
जाने कैसे जीते हैं..
तुम्हारे शहर के लोग,
एक के बाद एक
धमाका खुद को दोहराता है।
ये मेरी शिकायत नहीं,
ना कोई गिला मुझे..
अपने दायरे में खुश हूं मैं,
लेकिन..
तुम कैसे जीते होगे..
बस.. यही सवाल
मन को बहुत डराता है।
तुम्हारे शहर को देखा
तब सोचा..
मेरे शहर में कितना सन्नाटा है..
मेरे शहर मे कितना सन्नाटा है।


अनु गुप्ता
14 मार्च 2010

Wednesday, November 25, 2009

आप भी सोचो, मैं भी सोचूं...


एक साल बीता.. जैसे बीता कोई पड़ाव.. लेकिन अब तक नहीं बदले हालात.. आज भी खिलवाड़.. कभी धमाका.. कभी हत्या.. नहीं लिया कोई सबक.. 26/11 का एक साल.. शहीद हुए कई जाबांज.. बचा लिया देश.. दे दी आहुति प्राणों की.. क्या हमने कुछ सीखा.. क्या हम बदले.. नहीं.. नहीं और सिर्फ नहीं इसका जवाब.. क्या गया मेरा.. क्या गया तेरा.. मैनें नहीं खोया किसी को.. मैं भूल गई वो दिन.. खौफ की वो रातें तीन.. आज कुछ नम भी हो जाऊं.. लेकिन कल फिर भूल जाऊं.. तो क्या यही है श्रद्धांजलि.. यही है शहीदों की शहीदी.. इसलिए दी उन्होंने जान.. इसलिए हुए वो कुर्बान.. क्या यही होना था अंजाम.. आतंकियों ने डराया.. गोलियों से धमकाया.. लेकिन डटे रहे वो वीर.. उनका भी कोई घर था.. एक परिवार..जो बैठा था इंतजार में.. सांसों को अपनी थामकर.. लेकिन नहीं लौटा.. कोई बेटा, कोई सुहाग और कोई पिता.. बहन आज भी रोएगी.. मां का दिल भर आएगा.. पिता का मन होगा भारी.. लेकिन केवल शहीदी पर नहीं.. उनके सपूतों की धुंधली याद पर भी.. देश के हालात पर भी.. मार-धाड़ मची है यहां.. भ्रष्टाचार का बोलबाला.. अपनी-अपनी बनाने में लगे सभी.. फिर क्यों शहीद हुआ मेरा बेटा.. अगर होना था यही.. ऐसा तो नहीं सोचा था.. बयानबाजी जोरों पर.. राजनीति का बन गया मुद्दा.. लेकिन नतीजा ढाक के तीन पात.. क्यों नहीं बदलते हम.. मोमबत्ती जलाना ही नहीं श्रद्धांजलि.. वो महज भावनाएं.. बदलना है तो दिल से बदलें.. मजबूरी नहीं कर्तव्य.. देश ने दिया सब कुछ.. आप भी कुछ देना सीखें.. यही होगी श्रद्धांजलि.. ताकि.. फिर ना लौटे 26/11.. फिर ना हो कोई आंसू.. ऐसी जलाएं मोमबत्ती.. जैसें हों भावनाएं आपकी.. हैं तैयार आप..
आप भी सोचो.. मैं भी सोचूं..
26/11 के शहीदों को श्रद्धांजलि..

Wednesday, September 16, 2009

बस.. कह देना


जब ना रहे साथ,
और
खत्म हो हर बात
कह देना चांद से..
उसकी
चांदनी हमने देखी नहीं
कह देना बाग से..
उसमें
फूल हमारा खिला नहीं..
जब घिर आए रात,
और
बिगड़े हों हालात
कह देना रास्तों से..
उनसे
हम गुजरे नहीं
कह देना साज से..
उसमें
हमारी आवाज नहीं
जब मर जाए जज़्बात
और
जिंदगी लगे आघात
कह देना चाहों से..
उन्हें
हमारी ख्वाहिश नहीं
और कह देना आहों से..
उनमें
हमारा दर्द नहीं
जब भूलें हर मुलाकात..
कह देना ये बात
बस.. कह देना

अनु गुप्ता
16 सितंबर 2009

Friday, September 11, 2009

खिलौना जान कर तुम तो... (अंतिम भाग)


तमाशे के दो पाटों के बीच पिसती जिंदगी.. चेहरे पर शिकन.. हाशिए पर सिमटी खुशियां.. कुछ यही कहानी हो गई तमाम कलाकारों की। अब यहां हमेशा अफवाहों का बाजार गर्म रहता। साहबजी और मुनीमजी की खींचातनी से सभी वाकिफ थे.. लेकिन फिर भी कभी ऐसा लगता कि.. सब कुछ ठीक ही चल रहा है। तमाशे की टीआरपी चढ़ती-उतरती.. कभी इस कलाकार की तारीफ होती.. तो कभी उस कलाकार को सबके सामने खून का घूंट पीना पड़ता। तमाशे में चल रही खींचातनी का गवाह एक चाय की दुकान है.. वहीं इस सबकी चर्चा होती.. कौन आने वाला है.. कौन जाने वाला है.. लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ.. जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी.. कभी सपने में नहीं सोचा था.. परदे के पीछे एक और तमाशा हुआ.. खूब खबर उड़ी.. लेकिन इस तमाशे की गाज जिस शख्स पर गिरी.. वो बड़ा चौंकाने वाला था.. तमाशे के लपेटे में मुनीमजी आ गए.. मुनीमजी ही नहीं.. उनके साथ दो बड़े कलाकार भी.. कई बार तमाशे की कहानी बनाने-बिगाड़ने वाले लोग इस बार खुद कहानी बन गए.. लेकिन ये क्या.. तीनों कलाकारों को तमाशे से बाहर कर दिया गया.. जंगल में आग से भी तेज फैली ये खबर.. पर इस बार किसी के चेहरे पर शिकन नहीं.. कोई नहीं घबराया.. कहीं दबी हुई आवाज में खुशी नजर आती.. तो कहीं खुल्लमखुल्ला इसका जिक्र था..
इतना वक्त गुजर गया.. अब तक तमाशे के कलाकार इसके आदी हो चुके हैं.. उन्हें पता है.. यही उनकी कर्मभूमि है.. जिसने उन्हें पहचान दी.. अच्छी या बुरी.. और यही इस तमाशे की असल कहानी है.. यही इसका सबक.. कि.. ये कभी खत्म नहीं होने वाला.. टीआरपी बढ़े या फिर गिर जाए.. आना-जाना लगा रहेगा.. इसलिए तमाशे की शुरुआत कभी हुई हो.. कहीं भी हुई हो.. इसका कोई अंत नहीं.. ये अनंत है.. इसलिए मुस्कुराना भी जरूरी है.. भले उनकी डोर कभी किसी और के हाथ में हो...

इस सीरीज के पहले दो भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


अनु गुप्ता
11 सितंबर 2009