Thursday, June 4, 2009

सफर किया या नहीं

दिल्ली की बसों में सफर तो आपने कई बार किया होगा। हम डीटीसी और ब्ल्यू लाइन दोनों ही तरह के इन महान वाहनों की बात कर रहे हैं। आखिर हैं तो दोनों एक ही ना। एक बड़ी बहन और दूसरी छोटी बहन। क्यों ठीक है ना ?
खैर हम पूछ रहे थे कि आपने बस में सफर किया है या नहीं। अगर सफर नहीं किया तो हम दुआ करते हैं कि.. भगवान जल्दी ही आपको भी ये सौभाग्य दे। अरे ! चौंकिए मत, बस में सफर यानि यात्रा करना वाकई सौभाग्य है। इस पर जरा अपनी सूक्ष्म दृष्टि से विचार करिएगा। अब भला ये तो कोई बात नहीं हुई कि.. बस में यात्रा करते हुए भी आप बस इसकी कमियों पर ही ध्यान देते हैं। जनाब, जरा बस की खूबियों पर भी तो गौर फरमाइए। यदि आप ऐसा नहीं करते, तो आप बस में सफर करने वाले सबसे बड़े अज्ञानी हैं। भई, अब अपने नकारात्मक दृष्टिकोण को छोड़िए और जरा दिल्ली की बसों में यात्रा करने के इन फायदों पर नजर डालिए-
- आप अपनी दिनचर्या में इतना बिजी रहते हैं कि आपको एक्सरसाइज करने का वक्त भी नहीं मिलता। उस पर जंक फूड आपकी सेहत को दुरुस्त करने में कसर नहीं छोड़ता। तो बस का सबसे पहला फायदा यही है कि.. इसमें चढ़ने के लिए आपको थोड़ा-बहुत तो भागना ही पड़ेगा। इससे आपकी एक्सरसाइज भी हो जाएगी और बस में सबसे पहले चढ़ने की प्रैक्टिस भी।

- अब बात आपकी जेब यानि बचत की। बस में पचास की जगह सत्तर से अस्सी लोगों के होने का सबसे बड़ा फायदा यही है कि.. कंडक्टर की नजर से बचकर आप बिना टिकट के भी यात्रा कर सकते हैं। लेकिन इस विधा में आपको पल-पल की खबर रखनी होगी, वरना पकड़े जाने पर लेने के देने पड़ सकते हैं।

- लेकिन अगर आप टिकट खरीदना ही चाहते हैं तो.. इसमें आपके पड़ोसी बेमन से ही सही आपकी मदद कर सकते हैं। टिकट लेने की इस प्रक्रिया की लंबाई और वक्त आपके खड़े होने की जगह पर निर्भर करता है।

- बस का एक और लाभ है-भार मुक्ति। यानि अगर आप खड़े हैं तो अपना सामान अपने सीट वाले पड़ोसी को आदर सहित पकड़ा सकते हैं और अगर वो मना करें तो आपके दूसरे पड़ोसी कब काम आएंगे।

- बसों का एक फायदा है कि यहां मुफ्त में आपको झूलों (झटके और धक्के) का आनंद भी मिलता है। अरे दोस्त, इसलिए तो बस में जानवरों की तरह सवारी लादी जाती है। इसलिए जब भी बस बस रुकेगी या चलेगी तो आप कई तरह के झूलों का लुत्फ उठा पाएंगे।

- बस हमें भाईचारा भी सिखाती है। इसी भावना के वशीभूत होकर आप सीट पर बैठने के लिए थोड़ा-सा 'एडजस्ट' कर सकते हैं। कभी किसी महिला के लिए सीट छोड़ने पर भी आपको दुखी नहीं होना चाहिए। अंतर बस इतना है कि.. एडजस्ट कभी आपको करना पड़ेगा तो कभी लोग आपको एडजस्ट करेंगे।

- बस में झपकी लेने का मजा ही कुछ और है। संसार की सभी चिंताओं को भूलकर आप अपने पड़ोसी के कंधे पर सिर रखकर सो भी सकते हैं। अगर पड़ोसी सिर हटाए, तो क्या हुआ ? फिर सिर टिका दीजिए और अगर बात तू-तू, मैं-मैं पर आ जाए तो, माफी मांग लीजिए। जनाब, अच्छी नींद के बदले माफी मांगने से आप छोटे नहीं हो जाएंगे।

- और तो और बस मनोरंजन का भी साधन है। अगर दो लोग सीट या कम जगह को लेकर झगड़ा करें तो इससे आपका मनोरंजन भी होगा क्योंकि आनंद की इस चरम सीमा पर आप उन्हें रोकने तो जाएंगे नहीं। यही नहीं आपके पड़ोसी की निजी लेकिन मसालेदार बातें भी आप कान लगाकर आराम से सुन सकते हैं।

अब बताइए हैं ना बस का सफर मजेदार ? आपकी सभी सुविधाओं का ख्याल रखा जाता है बस में। यही नहीं बस गाहे-बगाहे आपको ऊपरवाले की याद भी दिला ही देती है। क्या अब भी आप बस में सफर नहीं करना चाहेंगे ? जरूर कीजिए, आखिर ये लुत्फ उठाने का अधिकार आपको भी है। ईश्वर जल्द आपको ये मौका दे और तब हम ड्राइवर से हमारा मतलब है कि भगवान से आपकी मंगल यात्रा के लिए दुआ करेंगे।

Sunday, May 24, 2009

नौकरी या इम्तिहान ?


आजकल मैं अपने इम्तिहान की तैयारी करने की कोशिश कर रही हूं। दरअसल अब तक ऑफिस से छुट्टियां नहीं मिली हैं। इसलिए कोशिश ही कह सकती हूं। हालांकि मेरा मानना यही है कि.. कोशिश ही हमें कामयाब बनाती है। मैं कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से मास कम्युनिकेशन्स में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रही हूं।


खैर, अब मुद्दे की बात.. जिसके लिए ब्लॉग लिख रही हूं। एक और इम्तिहान है.. जिसे रोजाना देती हूं। और दिन के अंत यानि अपनी शिफ्ट के आखिर में यही सोचती हूं कि.. एक और इम्तिहान खत्म हो गया। मैं पास हुई या फेल ? ये इम्तिहान है किसी मीडिया हाउस या चैनल के दफ्तर में एक दिन गुजारने का। मेरी निजी सोच यही है कि.. इससे जुड़े ज्यादातर लोग ही रोजाना इस इम्तिहान में बैठते हैं। ये परीक्षा ही तो है कि.. बेतहाशा दबाव में भी बेहतर काम करने की कोशिश की जाए। चीख-चिल्लाहट और बेवजह शोर को अनसुना करते हुए बस काम किया जाए। या कभी बिना किसी ठोस बात के गुस्सा कर रहे बॉस की डांट सुनी जा। मन में कहीं न कहीं यही बात होती है कि.. शायद आज तो बात बिगड़ी ही समझो। इसलिए दफ्तर में हर एक दिन नए इम्तिहान जैसा है।


यूं तो विद्वानों ने जिंदगी को भी इम्तिहान की संज्ञा दी है। ये सही है या गलत.. ये तो आपके निजी अनुभव पर निर्भर करता है। लेकिन इस इम्तिहान के सामने तो जिंदगी भी आसान लगती है। वो बात अलग है कि.. इसने नौकरी को आसान बनाने की जुगत ने जिंदगी को ही मुश्किल कर दिया है।


यहां लोगों को नौकरी बचाने के लिए जुगाड़ करते देखा है। अपनी नौकरी सेफ जोन में रखने के लिए दूसरों की नौकरी को मुश्किल में डालते लोगों को भी देखा है। ब्रेकिंग न्यूज के वक्त गुस्से का ऊंचा पारा देखा है। न्यूज रूम की दौड़-भाग में मैं भी शामिल होती हूं। यही दौड़ जिंदगी का हिस्सा बन गई है। इसमें हारने का डर नहीं है लेकिन पिछड़ने का ही खतरा हमेशा बना रहता है। आप अव्वल भले ना हों.. लेकिन अव्वल दर्जे के समकक्ष होना भी सुखद लगता है। इसलिए ये इम्तिहान है। और अगर हर बीतते हुए दिन के साथ आपकी नौकरी बची हुई है.. तो यकीनन आप इसमें पास हैं.. क्योंकि ये इम्तिहान ऐसा है.. जिसमें रोजाना फेल होने का डर होता है।

इस इम्तिहान के लिए मेरे साथ-साथ आपको भी 'बेस्ट ऑफ लक'




Saturday, May 9, 2009

भारत को बचा ले विधाता

जन गण मन अधिनायक
जय है
भारत भाग्यविधाता
राष्ट्रगान की इन पंक्तियों को यहां लिखते हुए न तो मैं और न इन्हें पढ़ते हुए आप खड़े होंगे। टेलीविजन पर 26 जनवरी की परेड और 15 अगस्त का कार्यक्रम देखते हुए जब राष्ट्रगान बजता है, तो क्या आप खड़े होते हैं। शायद नहीं, क्योंकि हमें इतना ख्याल ही नहीं रहता। क्या ये राष्ट्रगान का अपमान नहीं है? क्या जवाब देंगे आप? राम गोपाल वर्मा पर उनकी फिल्म रण में राष्ट्रगान से छेड़छाड़ करने का आरोप लगाया गया। विवाद उठने लगा तो सेंसर ने फौरन गाने को फिल्म से हटाने का निर्देश जारी कर दिया। राष्ट्रगान के साथ छेड़छाड़ तो जरूर की गई है, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? क्या उस पैरोडी का एक एक शब्द हकीकत तो बयान नहीं करता।रबिन्द्रनाथ टैगोर ने इसे संस्कृत मिश्रित बंगाली में लिखा था। 27 दिसम्बर 1911 को इंडियन नेशनल कॉंग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में इसे पहली बार गाया गया। जिसके बाद संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को इसे राष्ट्रगान का दर्जा दिया। इसे गाने का कुल समय 52 सेकंड का होता है।

जरा गौर करिए
जन गण मन अधिनायक जय हे
भारत भाग्यविधाता
पंजाब सिंध गुजरात मराठा
द्राविड़ उत्कल वंग
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा
उच्छल जलधितरंग
तव शुभनामे जागे,
तव शुभ आशिष मांगे
गाहे तव जयगाथा
जन गण मंगलदायक जय हे
भारत भाग्यविधाता
जय हे, जय हे, जय हे
जय जय जय जय हे!

अब देखिए राष्ट्रगान की पैरोडी

जन गण मन रण है, जख्मी हुआ है
भारत का भाग्यविधाता
पंजाब सिंध गुजरात मराठा
एक दूसरे से लड़के मर रहे हैं
इस देश ने हमको एक किया
और हम देश के टुकड़े कर रहे हैं
द्रविड़ उत्कल वंग,
खून बहाकर एक रंग का, कर दिया हमने तिरंगा
सरहदों पर जंग और गलियों में फसाद रंगा
विंध्य हिमाचल यमुना गंगा में तेज़ाब उबल रहा है
मर गया सबका सवेरा, जाने कब जिंदा हो आगे
फिर भी तव शुभ नाम जागे,
तव शुभ आशिष मांगे
आग में जलकर चीख रहा है,
फिर भी कोई नहीं बचाता
गाहे तव जयगाथा
देश का ऐसा हाल है, लेकिन आपस में लड़ रहे नेता
जन गण मंगलदायक, भारत को बचा ले विधाता
जय है या मरण है,
जन गण मन रण है

राष्ट्रगान और इस पैरोडी में अंतर तो है और वो अंतर होना लाजमी भी है। रबिन्द्रनाथ टैगोर ने जब राष्ट्रगान लिखा होगा.. तब उन्होंने नहीं सोचा होगा कि.. एक दिन देश की ये हालत होगी। भारत भ्रष्टाचार और आतंकवाद से जूझ रहा है। बावजूद इसके आज भी हम अपने आपसी झगड़ों को ही नहीं भुला पाए हैं। कभी गुजरात दंगों के नाम पर तो कभी मुंबई हमलों के नाम पर राजनीति की रोटियां सेंकी जा रही हैं। हमारी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है। इसके जिम्मेदार हम खुद भी हैं। जब हम अपने अंदर से ही भ्रष्टाचार नहीं मिटा सकें तो देश को सुधारने की कैसे सोच सकते हैं। अमेरिकी अखबार में रिपोर्ट छपती है कि.. भारत गले तक भ्रष्टाचार में डूबा है। इस रिपोर्ट को टेलीविजन पर देख-सुनकर हम आदतन नेताओं और अफसरों को कोसने लगते हैं। लेकिन अपनी बात भूल जाते हैं। अपनी कमजोरियां तब हमें याद नहीं आती। दुनियाभर में भारत को विविधता में एकता वाले देश के रूप मे जाना जाता है। हमारी सदियों पुरानी संस्कृति-सभ्यता हमारी पहचान है। जब वो पहचान भ्रष्टाचार की गंदगी से धुंधला रही है.. तो हमारा ध्यान वहां नहीं जाता। क्या देश का अपमान नहीं है? क्या ये हमारी भावनाओं का अपमान नहीं है? लेकिन हम उसे सुधारने की कोशिश नहीं करते.. क्योंकि उसके लिए पहले हमें खुद को सुधारना होगा। फिल्म रण में राष्ट्रगान में कुछ बदलाव करके.. देश के हालात बयां करने की कोशिश की गई तो... वो हमें अपना, अपनी भावनाओं और राष्ट्रगान का अपमान लग रहा है। इसलिए हंगामा खड़ा कर दिया। अगर गीतकार अपने शब्दों को महज आम गीत की तरह पिरोकर गाना बना देता.. तो क्या हमारा ध्यान उस तरफ जाता। गीत और गीतकार को तारीफ तो जरूर मिल जाती। लेकिन वो ऐसी चोट शायद नहीं कर पाता, जैसी अब कर रहा है। गीतकार के शब्द तब उतने सार्थक नहीं होते.. जितने अब हैं। भले ही इसे छेड़छाड़ कहा जाए.. लेकिन है तो हकीकत ही.. जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। आज देश के हालात देखकर भले ही हम न सुधरे.. लेकिन दिल से आवाज यही उठती है कि.. 'भारत को बचा ले विधाता'

Thursday, November 20, 2008

ठंडी आँखें...


मौकापरस्त हो चुकी हैं आंखे
तलाश रहती है इन्हें...
नए-नए कुछ तमाशों की,
तड़पते-छटपटाते किसी हादसे में...
दम तोड़ती आवाजों की,
भटकती हैं यहां वहां...
सिसकती हुई भावनाओं के पीछे
एक नई खबर के लिए
दूर तक दौड़ती हैं रास्तों पर...
जबरन किसी मुद्दे के पीछे
ताकती हैं आसमान को भी...
खुद को भिगोने की ख्वाहिश में
ढूंढती हैं आसपास ही कहीं...
बेबस किस्सों के निशान
फिर नई कहानी के लिए
गमज़दा हो तो झुक जाती हैं...
एक रस्म निभाने को, क्योंकि...
मौकापरस्त हो चुकी हैं आंखे

जिम्मेदार कौन... ?


आज एक बार फिर वह कायर साबित हुआ... उसके कदम नहीं उठ सके थे... क्योंकि, वे चार लड़के घोषित बदमाश थे... क्योंकि, उनके पास रिवॉल्वर थी... क्योंकि उसके पास वक्त नहीं था... क्योंकि वह किसी और के झमेले में नहीं पड़ना चाहता था... क्योंकि, जिस युवती के साथ वो लड़के छेड़छाड़ कर रहे थे..., वो उसकी रिश्तेदार या दोस्त नहीं थी। इस घटना को उसने अपने दोस्तों के साथ शेयर किया। पुलिस और सिस्टम को गैर-जिम्मेदार बताया। कुछ दिन बाद ही शहर के एक अखबार में बलात्कार की एक खबर छपी। लेकिन आज वो बहुत रोया, छटपटाया, और... पछताया भी। इस घटना को वह किसी के साथ शेयर नहीं कर सका। आज उसने खुद को कोसा, क्योंकि पहली बार वह उस तकलीफ को महसूस कर सका था, क्योंकि... पीड़ित लड़की उसकी बेटी थी...

Tuesday, August 5, 2008

आशाएं


आज उसे कहीं काम नहीं मिला। पिछले दिन की बची हुई मजदूरी से उसने अपनी झोपड़ी के लिए बल्ब खरीदा, क्योंकि उसकी पत्नी को कपड़े सीने में कठिनाई होती थी। वह निराश नहीं था। आने वाले कल के लिए उसके मन में 'उम्मीद' थी। उसे उम्मीद थी... अपने बच्चों के अच्छे भविष्य की। विश्वास था उसे कि... उसके बेटे को नौकरी जरूर मिलेगी। रात को बाजरे की रोटी और प्याज खाकर 'अच्छी नींद' सोया, क्योंकि नेताजी ने कहा था कि... इस बार चुनाव के बाद सभी को रोटी, कपड़ा, मकान और उचित काम मिलेगा। आने वाले इसी अच्छे कल की आशा में वह इस दुनिया से विदा हो गया। पर उसकी 'आशाएं'... आज भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती जा रही हैं... "ज़िंदा हैं..."

Wednesday, June 25, 2008

"बदले-से रिश्ते"

पूछा एक दिन मैंने.. खुद,
अपने ही 'साए' से
क्यों बढ़ गई हैं दूरियां...
क्यों रिश्ते हुए पराए से?
प्यार नाम का शब्द नहीं है...
रिश्तों की गहराई में,
दिख रहे हैं सारे रिश्ते...
हर पल कुछ घबराए से।
दूरियां बढ़ती जा रही हैं...
सागर की लम्बाई में,
दूर होता जा रहा जीवन...
अपनों की परछाई से।
व्योम जितनी ऊंचाई हैं और...
बिखर रहे हैं रिश्ते सभी,
ठिठुर रही हैं रिश्तों की गर्माहट,
कैसे इन सर्द हवाओं से।
कारण पूछा इस सबका तो...
बोला कुछ ठंडाई से,
कड़वाहट बढ़ती जा रही है...
रिश्ते हो गए स्वार्थी-से...
तोले जाते हैं अब तो ये...
पैसों की ही ताकत से।
फासलें सौ-सौ मीलों के हैं....
इसलिए रिश्ते हुए पराए से।