Tuesday, July 21, 2009

तुझ में नहीं मैं


तुझ में,
दूर कहीं
भीतर-बाहर की
गहराइयों में भी..
तलाशा खुद को
अपना वजूद
तुझ में ही कहीं
मन में,
दिल में,
और धड़कन में भी
ढूंढी अपनी आवाज
तेरी नजरों में,
ख्वाबों में,
कभी बातों में भी
सोचा मेरे जिक्र को
हंसी में,
नमी में,
तेरी खामोशी में भी
नहीं जाना अपने को
फिर भी
तलाशती रही
देर तक.. दूर तक
लौट आईं बेबस निगाहें
क्योंकि
तुझ में
मैं नहीं.. कहीं नहीं

अनु गुप्ता
21 जुलाई 2009

6 comments:

Mithilesh dubey said...

लौट आईं बेबस निगाहें
क्योंकि
तुझ में
मैं नहीं.. कहीं नहीं
bahut khub, kafi dard bhara hai aapki bhavnao me.

अनिल कान्त : said...

दिल से लिखी गयी कविता...दिल में घर कर जाती है ...

मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

Udan Tashtari said...

भावपूर्ण रचना.

mehek said...

sunder bhavbhari rachna badhai

सुबोध said...

कुछ उलझी कुछ सुलझी
लेकिन कुछ अनसुलझी
फिर भी सबकुछ कह जानेवाली
एक कविता

ARUN said...

gehrai bato ko bahut pyaar se saza ke, shabd ko aaiyna bana ke didaar kara deya hai is kavita ne.

bahut hi achhi poem hai.. or photo selection bhi bahut zabardast hai.