Friday, September 11, 2009

खिलौना जान कर तुम तो... (अंतिम भाग)


तमाशे के दो पाटों के बीच पिसती जिंदगी.. चेहरे पर शिकन.. हाशिए पर सिमटी खुशियां.. कुछ यही कहानी हो गई तमाम कलाकारों की। अब यहां हमेशा अफवाहों का बाजार गर्म रहता। साहबजी और मुनीमजी की खींचातनी से सभी वाकिफ थे.. लेकिन फिर भी कभी ऐसा लगता कि.. सब कुछ ठीक ही चल रहा है। तमाशे की टीआरपी चढ़ती-उतरती.. कभी इस कलाकार की तारीफ होती.. तो कभी उस कलाकार को सबके सामने खून का घूंट पीना पड़ता। तमाशे में चल रही खींचातनी का गवाह एक चाय की दुकान है.. वहीं इस सबकी चर्चा होती.. कौन आने वाला है.. कौन जाने वाला है.. लेकिन अचानक कुछ ऐसा हुआ.. जिसकी उम्मीद किसी को नहीं थी.. कभी सपने में नहीं सोचा था.. परदे के पीछे एक और तमाशा हुआ.. खूब खबर उड़ी.. लेकिन इस तमाशे की गाज जिस शख्स पर गिरी.. वो बड़ा चौंकाने वाला था.. तमाशे के लपेटे में मुनीमजी आ गए.. मुनीमजी ही नहीं.. उनके साथ दो बड़े कलाकार भी.. कई बार तमाशे की कहानी बनाने-बिगाड़ने वाले लोग इस बार खुद कहानी बन गए.. लेकिन ये क्या.. तीनों कलाकारों को तमाशे से बाहर कर दिया गया.. जंगल में आग से भी तेज फैली ये खबर.. पर इस बार किसी के चेहरे पर शिकन नहीं.. कोई नहीं घबराया.. कहीं दबी हुई आवाज में खुशी नजर आती.. तो कहीं खुल्लमखुल्ला इसका जिक्र था..
इतना वक्त गुजर गया.. अब तक तमाशे के कलाकार इसके आदी हो चुके हैं.. उन्हें पता है.. यही उनकी कर्मभूमि है.. जिसने उन्हें पहचान दी.. अच्छी या बुरी.. और यही इस तमाशे की असल कहानी है.. यही इसका सबक.. कि.. ये कभी खत्म नहीं होने वाला.. टीआरपी बढ़े या फिर गिर जाए.. आना-जाना लगा रहेगा.. इसलिए तमाशे की शुरुआत कभी हुई हो.. कहीं भी हुई हो.. इसका कोई अंत नहीं.. ये अनंत है.. इसलिए मुस्कुराना भी जरूरी है.. भले उनकी डोर कभी किसी और के हाथ में हो...

इस सीरीज के पहले दो भाग पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।


अनु गुप्ता
11 सितंबर 2009

2 comments:

संजय तिवारी ’संजू’ said...

आपकी लेखन शैली का कायल हूँ. बधाई.

सुबोध said...

ये कहानी केवल नाटक की ही नहीं बल्कि जिंदगी की है...आना जाना, उठना गिरना, नोचना खसोटना इस नाटक के हिस्से भर हैं...इसी नाटक के बहाव में कुछ खलनायक बन जाते हैं कुछ नायक...कहानी बनती रहती है बहती रहती है। कहानी वही रहती है बस कहने के सलीके बदलते हैं। एक दिलचस्प कहानी का बेहद दिलचस्प बखान