Monday, June 7, 2010

इस मजाक का शुक्रिया !


हा हा हा हा हा.. ही ही ही ही..
अरे भई हैरान मत होइए. मैं हंस रही हूं. वैसे इस तरह नहीं हंसती. ये तो बस आपको जताने के लिए.
खैर, अब हंसने की वजह भी बता दूं, आप जानना तो चाहते हैं ना. प्लीज इनकार मत करिए. शायद आपको भी हंसी आ जाए. और कुछ नहीं खून की कुछ बूंद बढ़ जाएंगी. ये बात अलग है कि.. ये बढ़ा हुआ खून आंखों से बहने लगे.

घबराइए मत, हो सकता है ऐसा आपके साथ ना हो. चलिए, और ज्यादा सस्पेंस नहीं बढ़ाना चाहती. वक्त की कमी आपके पास भी है और मेरे पास भी.

25 साल लंबा इंतजार, पहले जो त्रस्त थे.. आज एक फैसले से पस्त हो गए हैं. उनके हौंसले अब भी बुलंद हैं, हिम्मत बाकी है.. लेकिन आज जो कुछ हुआ.. जो फैसला आया, वो हमारी कानून व्यवस्था पर सवाल है. 25 साल के इंतजार का ये फल मिला. बस दो साल और 5 लाख रूपये. बस.. क्या इतनी सस्ती है इंसान की जान. हजारों लोग जो काल का ग्रास बन गए, लाखों लोग.. जो आज भी बीमारियों से संघर्ष कर रहे हैं.. उनके इंतजार का ये फल ? शर्मनाक है भोपाल सीजेएम कोर्ट का फैसला. फैसला सुनकर दुख तो हुआ, लेकिन हंसी भी आ गई. कानून जानने वालों का ये हाल ? कमाल है.. ऐसा कैसे हो सकता है ?

भोपाल गैस त्रासदी को 25 साल से ज्यादा बीत गए. भोपाल इंतजार करता रहा. कब फैसला आए और कब उसके बाशिंदों को इंसाफ मिले. लेकिन नहीं ऐसा नहीं हुआ. 25 साल पहले कब्रिस्तान में तब्दील हुए शहर ने ऐसा नहीं सोचा होगा कि.. उसे बर्बाद करने वाले २ साल की कैद और पांच लाख रूपये जुर्माने की सजा पर निबटा दिए जाएंगे. क्या कानून यही कहता है ? क्या सचमुच ये इंसाफ है ? सीजेएम कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड के 8 अधिकारियों को केवल 2-2 साल की सजा और पांच-पांच लाख जुर्माने की सजा सुनाई. बस इतना ही नहीं, सजा सुनाए जाने के कुछ मिनट बाद 25 हजार के मुचलके पर जमानत भी मिल गई. क्या कहने हैं.. जोर का झटका जोर से ही लगा. 2-3 दिसंबर 1984 की रात मिथाइल आइसोसाइनाइट गैस ने लोगों का दम घोंट दिया था और आज अदालत के इस फैसले ने उन्हें मारने का ही काम किया है.

25 साल बाद भी फैसला आया तो सीजेएम कोर्ट में.. इसके बाद हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट बाकी हैं. फिर आरोप-प्रत्यारोप, फिर कानून खरीदने-बेचने का काम और शायद फिर भी किसी को सजा नहीं मिलेगी. भोपाल गैस त्रासदी को दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटना बताया जाता है. और 25 साल के इंतजार के बाद पीड़ितों को आधा-अधूरा इंसाफ मिला. क्या इतने बड़े मामले में ऐसी सजा मिलनी चाहिए. क्या कानून की किताबों में यही लिखा है ? मैं कानून नहीं जानती, कानून के प्रावधान और दांव-पेंच.. सब मेरी समझ से परे हैं. सुना है कानून बस सबूत मांगता है. तो क्या गैस कांड में मारे गए लोगों की भयावह तस्वीरें सबूत नहीं हैं ? क्या आज भी अपंग पैदा होते बच्चे सबूत नहीं हैं ?

मुझे वाकई समझ नहीं आ रहा कि.. आखिर इस फैसले की वजह क्या है. 25 साल का इंतजार और केवल दो साल की कैद और पांच लाख रूपये जुर्माना. मैं क्या करूं ? मुझे समझ नहीं आ रहा. अपनी इसी नासमझी पर मुझे हंसी आ रही है. क्या आप मुझे समझा सकते हैं ? लेकिन प्लीज अब आप मत हंसना।
अनु गुप्ता
7 जून 2010

4 comments:

Jandunia said...

आपकी हंसी में वो दर्द है जो ये बयां कर रहा है कि जब इंसाफ नहीं मिलता है तो मन किस तरह से रोता है

Udan Tashtari said...

बहुत अफसोसजनक रहा. तकलीफ की अति भी हँसी ही देती है दर्दीली!!

Suman said...

nice

Rav Pandey said...
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